श्री बलवंतसिह चिराना शिक्षाविद की संघर्ष से सफलता की कहानी

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श्री बलवंतसिह चिराना शिक्षाविद की संघर्ष से सफलता की कहानी

  • by Admin
  • 1970-01-01 00:00:00

"सीकर ,एक अजीब दास्तां बहुत ही मुश्किल दौर लोग कंगुरे को देखते है नींव पर नजर कभी नही जाती मात्र 7 वर्ष की छोटी सी उम्र मे पिताश्री का साया समय के कालचक्र ने छिन लिया पिताश्री एक फेक्ट्री मे फोरमेन थे दो भाई दो बहन मे आप सबसे बडे किस तरह से जीवन यापन करना ये सोचकर पुरा परिवार हैरान हो गया । उस समय के दौर मे आपके मासीसा ने सहारा दिया सभी बच्चो की देखभाल का जिम्मा लिया लिया पढाई मे बहुत होशियार थे इसलिये छोटी सी उम्र मे गर्मी की छुट्टियों मे एक्सट्रा क्लासेस को पढाने की जिम्मेदारी ली महिने का 30 रुपया ट्यूशन का मिलता था सभी बच्चो को पढाने का धीरे -धीरे आपने दसवी की हर वर्ष गर्मी की छुट्टियों मे पढाकर अपना खर्चा निकालते थे 11 वी मे आने के बाद और ज्यादा चिंता हो गयी पढाई का खर्च कौन उठाये 10 वी के बच्चो को पढाया और आपने प्राईवेट फार्म भरके कालेज मे दाखिला लिया यहा से शुरु हुयी जीवन की कहानी सुबह से शाम तक सडक के किनारे सीकर से नवलगढ़ तक वृक्षारोपण हुये पेडो की देखभाल करना दिन भर का मेहनत करके शाम को 7 रुपये मिलते थे । सीकर मे स्कुल मे 100 रुपये की नौकरी पर रहे । जिंदगी जिस राह पर लेकर जा रही थी उस ओर चलते गये ये सोचकर की कभी तो जीवन की कहानी बदलेगी कभी सपने मे भी नही सोचा था कि जीवन मे एक दिन बहुत बडा आदमी बनुगा जो व्यक्ति आशावादी होते है वे अपने साथ अपने परिवार गाँव व समाज का नाम रौशन करते है आपने भी कुछ इस तरह ही किया जयपुर मे टैगोर स्कुल मे नौकरी पर लग गये वहा के संस्थापक के यहा सब काम करना पडता था घर के कामकाज से लगाकर स्कुल मे बच्चो को पढाना जीवन के इस सफर से तंग आ गये थे एक तो पिताश्री का साया नही उपर से ठीक से कोई काम नही और भाई बहन भी छोटे नसीब ने करवट बदली लिखने का बहुत शौक था और राजस्थान पत्रिका मे पत्रकार की नौकरी मिल गयी । तीन बरस तक पत्रकारिता की 1991 मे आपने गाँव मे एक स्कुल खोला उसमे 100 बच्चे पढने आये पत्रकारिता के समय जयपुर से रात मे एक बजे तक घर पहुचना और सुबह स्कुल शुरु करके 9 बजे फिर जयपुर जाना मानो भगवान ने हर तरफ से परीक्षा लेना शुरु कर दिया आपने सीकर मे पहला स्कुल खोला जो अग्रेंजी माध्यम से था । इसी बीच जब आपने स्कुल खोली तब आपकी शादी हुयी सीकर मे ही जगदीशसिह जी निर्वाण की पुत्री से जब व्यक्ति जीवन मे असफल होता है तब एक बात ये तो सत्य है कि भाग्य का दरवाजा धर्मपत्नी के आने के बाद खुलता है आपका भी भाग्योदय शादी के बाद हुआ जो स्कुल खोली थी उस स्कूल ने इतना नाम कमाया कि कभी पिछे मुडकर नही देखा ओर आज 6 स्कूल व दो कालेज है वे दुखो के पल वे परेशानीयो के पल आज भी भूलाये नही भूले जाते जब आप जयपुर की एक कच्ची झोपडपट्टी मे प्लास्टिक से ढकी झौपडी मे रहते थे । बारीश के दिनो मे सभी जगह से पानी गिरता था और पुरी पुरी रात बैठकर गुजारते थे । आओ इनसे मिल तो लेते है श्री बलवंतसिह जी श्री बजरंगसिंह जी बडगुजर आपका पेतृक गाँव -चिराना आज भी आपका परिवार संयुक्त है कोई अलग नही रहता । विधा भारती पब्लिक स्कुल विधाभारती संस्थान सीकर रोटरी क्लब के सदस्य रोटरी इंटरनेशनल के जोनल कोर्डिनेटर आपके जीवन मे कम से कम 30 बार शिक्षा के कार्यो को लेकर विदेशी धरा पर सम्मानित हुये आप पहले समाजबंधु है जो शिक्षा के क्षेत्र मे विदेशी धरा व भारत मे सम्मानित होने वाले पहले रावणा राजपूत बंधु है अपने आप को हमेशा रावणा राजपूत बताया समय समय पर अपना योगदान भी दिया समाज का किसी भी प्रकार का कोई पद ग्रहण नही किया एक वर्ष पहले आप पर जानलेवा हमला भी हुआ लेकिन भगवान की कृपा से बच गये सीकर के एक छोटे से गरीब परिवार से निकले ये समाजबंधु आज सफलताओ के शिखर पर है । सफलताये इनका पता पुछ कर दरवाजे तक आती है समाज का दर्द आज भी है सांवराद मे शहीद हुये सुईगांम के मोतीसिहजी के निधन पर आपने कहा था कि उनके बच्चो की पढाई की जिम्मेदारी लेता हु जीवन मे कोई भी व्यक्ति जब किसी लक्ष्य को सामने रख दे तो उस पर जीत का परचम हर हाल मे फहराया जाता है चिराना साहब का जीवन एक फिल्म की तरह है । आपकी कामयाबीयो के पिछे कितना दुख रहा इससे आज तक सभी अंजान थे । कच्ची झौपडी से लगाकर आज के शिशमहल के सफर तक जो दुख आपने देखा है ये किसी के लिये मार्गदर्शन से कम नही ।"