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Dr .Kesar Singh Solanki

"सभी सम्मानित अग्रणी बंधुओं को मेरा नमस्कार। हम बढ़ रहें हैं एक सुनहरे भविष्य के निर्माण की ओर। हमारे समाज ने भी दशा का सही आकलन कर विकास की दिशा में कदम ताल शुरू कर दी है। अब समय आ गया है स्वनियन्त्रण स्व अनुशासन एवं त्याग का। हमें अहंकार को त्यागकर छोटी छोटी बातों को गौर नहीं करना चाहिए। समाज में ग्रूप संचालक , संगठन पदाधिकारी सोशल मीडिया पर उलझ रहे हैं। समाज के कार्यक्रमों में आमंत्रण एवं मंचासीन होने तथा मंच से उद्बोधन के मौके देने अथवा नहीं देने को मुद्दा बनाकर पोस्ट कर रहे हैं ।यह शुभ संकेत नहीं है। आप अपनी भूमिका तय करें अपनी क्षमताओं एवं सीमा का सही आकलन कर समाज विकास में योगदान करें। सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें नकारात्मक विचारों को हावी नहीं होने दें। बात का बतंगड़ बनाने​ की बजाय स्थानीय स्तर पर मिल बैठ कर समस्याओं का समाधान ढूंढने का प्रयास करना चाहिए। यहां इतना ही आग्रह करना चाहूंगा कि पदलोलुपता और त्याग का एकाकार नहीं होने का, दो नावों पर पग रखने से सागर पार नहीं होने का। मित्रों, आज हमारे समाज में हमारे​ बन्धुओ की मानसिकता और सोच इस तरह की बन चुकी है कि हम अपनी ज़िन्दगी में कामयाबी की ऊंचाइयो को पाने के लिए दूसरे को गिराना ज़रूरी समझते हैं, अपनी जीत से ज़्यादा दूसरों को हराना ज़रूरी समझते हैं। दरअसल, आज यही सोच यही मानसिकता हमारे घर से लेकर बाहर तक फैली हुई है। आज घर-घर में भाई-भाई को हराने, गिराने या नीचा दिखाने की होड़ में लगा हुआ है। यही हाल आज हमारे समाज के प्रत्येक संगठन , ग्रूप , समितियों का भी हो चुका है, सभी एक दूसरे की बुराइयां, एक दूसरे की टांग खिंचाई और एक दूसरे को हराने में ही लगी रहती है। अक्सर हम अपनी जीत से ज़्यादा, दूसरों को हराने पर ज़्यादा ध्यान देते हैं और इसी चक्कर में पड़कर दूसरों को हराते-हराते एक दिन ख़ुद ही हार जाते हैं। असल में, यहां पर सवाल यह उठता है कि क्या एक दूसरे को गिराए बिना, हम ऊपर नहीं उठ सकते? क्या एक दूसरे को नीचा दिखाए बिना हम ऊंचे नहीं बन सकते? क्या एक दूसरे को हराये बिना, हम जीत नहीं सकते? जी नहीं मित्रों, ऐसा बिल्कुल नहीं है, ज़िन्दगी में कामयाबी पाने के लिए किसी को गिराना, किसी का नुक़सान करना, या किसी को हराना ज़रूरी नहीं, क्योंकि ऐसा करने से अक़्सर हम अपना ही नुक़सान कर बैठते हैं और किसी का बुरा सोचते-सोचते हम अपना ही बुरा कर बैठते हैं, क्योंकि किसी की कामयाबी की खींची हुई लकीर को मिटाना ज़रूरी नहीं, बल्कि उस लकीर के पास ही अपनी उससे बड़ी लकीर खींचकर कामयाबी पाना ही सही मायनों में कामयाब होना होता है। तो मेरे बंधुओं, हमें और आपको चाहिए कि अपनी ज़िन्दगी में बजाय दूसरे को गिराने के, नीचा दिखाने के, अपने ऊंचा उठने पर ध्यान दें, दूसरों को हराते-हराते ख़ुद हारने की बजाय, अपने जीतने पर ध्यान दें, दूसरों को नाक़ामयाब करने की बजाय अपनी कामयाबी पाने के ऊपर ध्यान दें। क्योंकि यही “इन्सानियत” है और यही इन्सानियत का तक़ाज़ा है।"