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Dr .Kesar Singh Solanki

"सिंहासन हिल उठे रावणाओ ने भृकुटी तानी थी, बिखरे हुए समाज में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई पहचान की कीमत सबने पहचानी थी, दूर कुरीतियों को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्रह में, वह पहचान पुरानी थी, रावणा युद्धवीरो के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लम्बी रैली वह तो आसिन्द वाली रैली थी।"