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कवि ,राजेन्द्र नारलाई

"हे! रंणबंके रावणा अंधेरे से बाहर निकलो समझो मेरी बात को उजालो के साथ चलो पहचानो अपनी जात को, सत्तर साल गुजर गये एक और साल गुजर जायेगा दुसरो के मत रहो भरोशे हाथ कुछ नही आयेगा, नया खुन है नया जोश है भुलो अब पुराने दौर को मजबुत करो समाज को बांधो एकता की डोर को, समाज की हर प्रतिभा को आगे अब लाना होगा अधिकारी है जिस मंझील केे निशां हमे वो अब पाना होगा, संघर्ष करने की क्षमता मे कोई रावणा का सानी नही वफादार है पुत्र रावणा के जिसने हार कभी मानी नही, अपनो से हारा है रावणा क्या अपनो का मन जीत पायेगा भाई ने दिया जो साथ भाई का फिर ध्वज रावणा लहरायेगा, ना किसी से कलह है हमारा ना किसी जाति से विवाद है अपनी ही टांग खिचाई मे हुआ रावणा बरबाद है, बदलते समय मे यारो तुम भी थोडा बदल जाओ बाहर निकलो शराब के समन्दर से शाकाहारी बन जाओ सुधारने समाज को हर सख्स को अब जागना है समाज ही जीवन है अपना समाज से कहा भागना है, कहे कवि राजेन्द्र समाज पर लिखना मेरा काम है समाज ही यारो सुबह है अपनी समाज ही अपनी शाम है ।"