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केसर सिह सोलकी ,जयपुर

"आज के इस तकनीकी युग में social media के माध्यम से समाज बंधु समाज के प्रति संवेदनशील सोच रखते हुए सकारात्मक सोच के साथ मिलकर आगे बढ़ रहे हैं । Facebook हो चाहे WhatsApp , Website ,समाजसेवी बन्धुओं द्वारा बढ चढ कर हिस्सा लेते हुए समाज प्रेम से ओतप्रोत भावनाओं का उदगार खुले मन से किया जा रहा है । समाज बन्धुओं के विचारों, उदगारो एवं लेखों को पढ कर ऐसा लगता है कि सामाजिक क्रांति का सूत्रपात हो चुका है । यह आहट है बदलाव की, छटपटाहट है स्व पहचान की । आज यदि आवश्यकता है तो विश्वास की, युवा जोश को सही दिशा में मोड़ने की एवं सामाजिक मंचों के समाज हित में निस्वार्थ उपयोग की । सामाजिक संगठनों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ रही है समाज बहुल सभी जिलों में अलग अलग नामों से संगठन समाज हित की बातें कर रहे हैं । क्या सामाजिक कार्य करने के लिए संगठन एवं पद पहली शर्त है ? क्या बिना सामाजिक संगठन में पद प्राप्त किए समाज सेवा संभव नहीं है ? आज जिसे देखो जिधर देखो बैनर एवं पद लेकर बयानबाजी शुरू कर दी जाती है । बयान व्यक्तिगत हो कोई बात नहीं पूरे समाज को सम्मिलित करते हुए बयान जारी करना आपत्तिजनक हो जाता है । कुछ टिप्पणी एवं बयान बिना यह सोचे कर दी जाती है कि इसका समाज पर क्या असर पड़ेगा । अधिकांश टिप्पणी अपने ही सामाजिक व्यक्ति / संगठन के खिलाफ होती है या बिना सोचे समझे अन्य समाजों एवं राजनीतिक दलों एवं नेताओं पर जहर उगल दिया जाता है । ऐसे नेता अभिनेता समाज को क्या संदेश /दिशा देना चाहते हैं समझ से परे है । मैंने पूर्व में भी निवेदन किया है कि समाज के लिए संगठन / संस्था / समिति का गठन कर समाज सेवा करना अच्छी बात है लेकिन इसके माध्यम से व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा समाज पर थोपना गलत बात है ।समाज के नाम पर गठित विभिन्न संगठनो का उद्देश्य एक ही है सिर्फ ओर सिर्फ समाज विकास तो फिर आपस में वैमनस्य क्यों? स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो सकती है लोकतान्त्रिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए सकारात्मक सामूहिक सोच रखने वाले संगठन ही आगे बढ़ सकते हैं । आज का युवा समाज भावना से ओतप्रोत है इसका उपयोग सामाजिक विकास हेतु किया जा सकता है लेकिन युवाओं की टिप्पणियों का मंथन किया जावे तो कई ऐसे प्रश्न उभर कर सामने आए हैं जिनका संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाता है । मुख्य रूप से निम्न विषय समय समय पर सामने आए हैं @ समाज की पहचान का संकट धीरे धीरे समाप्त हो रहा है अर्थात हमें किस नाम सबोधित किया जावे ,राज्य के ज्यादातर हिस्सों में रावणा राजपूत शब्द सर्व स्वीकार्य हो चला है किन्तु कोटा उदयपुर एवं बीकानेर संभाग में आज भी रावणा शब्द से परहेज करते हुए सिर्फ राजपूत नाम से ही पहचान बना सामाजिक संगठन चला रहे हैं । जातिगत जनगणना में भी जाति के कालम में अधिकांश शिक्षित वर्ग ने जाति का नाम राजपूत भरा है । यह पूर्वाग्रह समाप्त करना समय की पहली मांग है । @ हमारे समाज का नाम मूल ओ बी सी की जातियों में शामिल था अर्थात हमें प्रारंभ से ही आरक्षण का लाभ मिला हुआ है लेकिन हम अन्य समाजों के मुकाबले इसका कितना लाभ उठा पाए हैं ? यह विचारणीय प्रश्न है । गुर्जरों को एस बी सी आरक्षण देते समय सरकार द्वारा कराए गए सर्वेक्षण एवं अध्ययन में समाज की सरकारी नौकरियों में भागीदारी की स्थिति बड़ी दयनीय रही है । समाज को आरक्षण का लाभ दिलाने पर विचार करना होगा इसके लिए सामाजिक कार्यकर्ताओ को जिम्मेदारी लेनी होगी न वरन् शिक्षा का अलख जगाना होगा बल्कि मार्गदर्शन भी करना होगा । @ पूरे राज्य में विभिन्न सामाजिक संगठनों के सहयोग से प्रभावी समन्वय स्थापित कर हमारे संख्या बल का सही आकलन करना होगा । समाज की जनसंख्या के बारे में कोई अधिकृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं है विभिन्न संगठनों द्वारा यह संख्या 15 लाख से 60 लाख तक बताई जाती रही है । इन भ्रामक आंकड़ों से पीछा छुड़ाने के लिए तहसील स्तर पर सक्रिय समाज सेवी संगठनों को स्थानीय संख्या का आकलन किया जाना चाहिए इसके बाद ही सम्पूर्ण राज्य में संख्या आकलन हो सकता है । @ जब भी कोई राजनीतिक भागीदारी की बात आती है चुनावों का समय आता है या राजनीतिक नियुक्तियां होती है तो यह रोना पीटना शुरू हो जाता है कि समाज की उपेक्षा की जा रही है । हमारा कोई प्रतिनिधित्व लोकसभा विधानसभा व स्थानीय निकायों में नहीं है । इसके मूल कारणों पर विचार किए बिना ही सतही तौर पर बयानबाजी शुरू हो जाती है फलां व्यक्ति खराब है फलां दल खराब है फलां समाज खराब है । ऐसा नहीं होना चाहिए । स्थानीय सामाजिक नेतृत्व मजबूत करना होगा । समाज का संख्या बल राजनीतिक भागीदारी में काम करता है किन्तु इसके लिए समाज बन्धु की योग्यता , छवि, मेहनत, क्षेत्र में सक्रियता एवं राजनीतिक समझ पहली शर्त होती है इस कसौटी पर खरा उतरने पर ही सार्थक परिणाम आ सकेंगे । @ यदि सच्चे मन से समाज की सेवा करना चाहते हैं तो बैनर एवं पद का मोह छोड़कर समाज के इतिहास को संहिताबद्ध करे । स्थानीय स्तर पर शिक्षा, खेल, राजनीति, सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले बन्धुओं की जानकारी जुटावे उन्हें उचित सम्मान प्रदान करे । स्थानीय राजकीय सेवा में कार्यरत लोगों की सूचना आपस में साझा करे। @ ऐसा नहीं है कि समाज विकास में अब तक कुछ नहीं हुआ है विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा किए गए सुधारों एवं कार्य का ही परिणाम है कि आज पूरे राज्य में समाज की सम्पत्तिया सभा भवनों, मंदिरों, धर्मशालाओं छात्रावासो एवं अन्य ट्रस्ट के रूप में उपलब्ध है । आज आवश्यकताहै समाज के लोगों को इनके बारे में जानकारी उपलब्ध कराने की ताकि समाज के लोगों का इनसे जुडाव हो एवं इनका समुचित उपयोग सम्भव हो सके , समाज के लोग गौरवान्वित महसूस कर सके । @ राजनीतिक पृष्ठभूमि के समाज बन्धुओं को सतही स्तर पर पूरी जानकारी करनी होगी कि समाज के लोगों को आपस में कैसे जोडा जावे समाज का विश्वास हासिल कर अन्य समाज के लोगों में आपकी कितनी पैठ है इसका सही आकलन कर ही आगे बढ़ा जा सकता है । सिर्फ यह कहना कि समाज की इतनी संख्या है इतने वोट हैं फिर भी हमारा हक दूसरे मार रहे हैं । हक मांगने ओर रोने पीटने से नहीं मिलेगा हक स्वयं को मजबूत करने के साथ समाज को मजबूती प्रदान करने से ही मिल पाएगा । समाज को दोष देना बंद करना होगा । समाज विकास में अपना योगदान दे फिर समाज से अपेक्षा करे । समाज की छाती पर पैर रखकर आगे नहीं बढ़ सकते आगे बढ़ने के लिए समाज की परछाईं बनना होगा । @ आप जिस भी क्षेत्र में कार्यरत हैं वहीं से समाज सेवा प्रारंभ कर सकते हैं कहने का तात्पर्य यह है कि शैक्षणिक विकास सरकारी योजनाओं के लाभ समाज के व्यक्तियों को समय पर दिलाने में मदद रोजगार दिलाने में मदद सामाजिक कार्यक्रमो मे फिजूलखर्ची रोकने आदि मे मदद की जा सकती है । सामाजिक जाग्रति का अभियान गांव की चौपाल से शुरू होकर शहरों में बने सभा भवनों तक पहुंचने पर ही समाज विकास के सार्थक परिणाम आ सकेंगे ।"